मगध साम्राज्य का उत्कर्ष – हर्यक वंश, शिशुनाग वंश, नंद वंश, और मौर्य वंश

मगध साम्राज्य का उत्कर्ष का कारण 16 महाजनपद है जिसका प्रमाण जैन धर्म और बुद्ध धर्म से मिला है |  उन 16 महाजनपदों मैं राजनीतिक संघर्ष या साम्राज्य विस्तार का दौर चल रहा था और सभी महाजनपद आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे| हर साम्राज्य यह चाहता था कि उसका राज्य सबसे बड़ा और शक्तिशाली हो |

परिणाम स्वरुप सभी साम्राज्य आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे But सबसे आगे मगध साम्राज्य ही आया और सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बना |ऐसा क्या कारण था कि 16 महाजनपदों में से केवल मगध साम्राज्य का उत्कर्ष सबसे पहले और शक्तिशाली और सबसे बड़ा साम्राज्य बना |

मगध साम्राज्य का उत्कर्ष के कारण-

मगध साम्राज्य का उत्कर्ष के तीन प्रमुख कारण हैं-

आर्थिक कारण

किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए जरुरी होता है कि उसका आर्थिक स्थिति अच्छी हो और हमें पता है कि उस समय लोहे की खोज के करण संपूर्ण भारत में विकास के दौर चल रहा था | लेकिन सबसे ज्यादा विकास मगध साम्राज्य में देखने को मिलता है Because मगध साम्राज्य नदियों के पास बसा हुआ था |  जिससे वहां की जमीन कृषि योग्य थी और यहां पर कृषि अधिशेष कृषि होती थी अर्थात ऐसे किसी जो हमारी जरुरत को पूरा करने के बाद कुछ किसी बच जाती है| जब अधिशेषकृषि या उत्पादन होता था तो उसे दूसरी जगह बेचकर अपनी आर्थिक आए को बहाते थे जब आर्थिक आय में वृद्धि हुई तो उस क्षेत्र का विकास तेजी के साथ हुआ |

राजनीतिक कारण

किसी भी क्षेत्र के राजनीतिक विस्तार के लिए जरूरी होता है कि वहां का राजा सबसे शक्तिशाली हो और मगध साम्राज्य की यह सबसे अच्छी बात रही, कि जो एक के बाद एक वंश आया, उन सभी वंश में कुछ महत्वपूर्ण राजा हुए | जिन्होंने मगध साम्राज्य के विस्तार को आगे बढ़ाया, साथ ही प्रशासनिक व्यवस्था जितनी अच्छी होती है | उसी हिसाब से राजा काम कर पाता है और मगध साम्राज्य एक पहला राजवंश बना जहां एक अच्छा प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जा सका जिससे मगध साम्राज्य के विस्तार में मदद मिली थी |

भोगोलिक कारण

यह सबसे जरुरी रहा मगध के विकास के लिए Because मगध साम्राज्य गंगा नदी और एक तरफ से गंधक नदी और दूसरी तरफ से सोन नदी के संगम पर मगध साम्राज्य बसा हुआ था | इन नदियों के होने के कारण, वहा पर बड़ी ही आसानी से व्यापार किया जा सकता था और यहां पर जंगली लकड़ी (Wild Wood) बड़ी मात्रा में पाई जाती थी | जिस का प्रयोग वे अलग-अलग कामों में करते थे | जैसे- रथ बनाना और सबसे महत्वपूर्ण छोटानागपुर राज्य मगध के हिस्से में आता था | जहां से बड़ी मात्रा में लोहा प्राप्त किया जाता था और उस समय लोहे की खोज ने देश में क्रांतिकारी दौर को लेकर आया था |

लोहे की पर्याप्त मात्रा मगध के पास होने के कारण ना केवल उनसे औजार बनाए गए, बल्कि उनसे War में काफी मदद मिली | जिससे हर जगह मगध की जीत हुई उसके अलावा जंगलों से बड़ी मात्रा में हाथी पकड़े गए जोकि सेना का अंग बने | इन हाथियों की मदद से मगध के राजाओं ने कई युद्ध जीते थे | इन सभी कारणों से मगध साम्राज्य तेजी से अन्य साम्राज्य की तुलना में सबसे आगे बढ़ कर आए थे

मगध के वंश

मगध साम्राज्य का उत्कर्ष का करण चार वंश भी है |

  1. हर्यक वंश
  2. शिशुनाग वंश
  3. नंद वंश
  4. मौर्य वंश

हर्यक वंश

मगध साम्राज्य का उत्कर्ष का पहला वंश-

  •  यह प्रथम वंश था |
  • पितृहंता के रुप में प्रसिद्ध था Because इसमें ज्यादातर राजाओं के पुत्रों ने अपने पिता को मारकर राजा बने थे |
  • संस्थापक – बिंबिसार (544 BC)
  • राजधानी – राजगृह
  • राजवैध नामक जीवक ने बुद्ध और अवंती के राजा की सेवा की थी |
  • बिंबिसार पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए युद्ध की बजाए, विवाह करना उचित समझा था | अर्थात इन्होंने युद्ध ना करके विवाह करके अपने राज्य का विस्तार किया इन्होंने तीन राजकुमारीयो से विवाह किया-
  • 1. महाकोशल जो कोशल वंश की पुत्री थी |
  • 2. चल्लना जो वैशाली वंश की पुत्री थी
  • |3. क्षेमा जो मद्र वंश की पुत्री थी |

अजातशत्रु ( बिंबिसार का पुत्र )

  • जिसे कुणिक के नाम से भी जाना जाता है
  • इसने 492 BC मैं अपने पिता बिंबिसार की हत्या करके राजा बना था
  • इसने वैशाली राज्य जहां से उसके पिता ने शादी की थी उस राज्य वैशाली और काशी को युद्ध करके जीत लिया था
  • इसी काल के दौरान बुद्ध की मृत्यु हुई थी और बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद प्रथम बार सभा का आयोजन इसी काल में किया गया था |

उढयन ( अजातशत्रु का पुत्र )

  • जिसे उढायिन के नाम से भी जाना जाता है|
  • इसने भी अपने पिता अजातशत्रु की हत्या करके राजा बना था|
  • इसने गंगा, सोन, गंधक, के संगम पर पाटलीपुत्र नामक राज स्थापना की तथा उसे मगध की राजधानी बनाई |

शिशुनाग वंश

मगध साम्राज्य का उत्कर्ष का दोसरा वंश-

  • शिशुनाग वंश के संस्थापक शिशुनाग ने की थे |
  • जो पहले मंत्री था|  बाद में राजा बन गया था |
  • इन्होंने मगध की राजधानी वैशाली को बनाया था |
  • इसने अवन्ती राज को जीतकर मगध में शामिल कर लिया था

कालाशोक ( शिशुनाग का पुत्र )

  • इसने इसने पुनः राजधानी को पाटलीपुत्र में बदल दिया
  • इसी काल के दौरान बुद्ध की दूसरी सभा का आयोजन किया गया
  • इस वंश के अंतिम राजा नंदीवर्धन थे |

नंदवंश

मगध साम्राज्य का उत्कर्ष का तीसरा वंश-

  • नंदवंश के संस्थापक महापदमानंद थे |
  • जो बहुत ज्यादा शक्तिशाली थे |
  • यह भारत का पहला शासक था जिसने सकराट की उपाधि धारण की थी |
  • पुराणों में महापदमानंद को परशुराम का दूसरा अवतार बताया है
  • इसने कलिंग पर हमला करके उसे जीतकर वहां से जैन (जिनसेन) की मूर्ति को मगध लाया था |
  • इसने कलिंग नहर खुदाई थी |
  • अंतिम शासक घनानंद थे जो बहुत क्रोधित व्यक्ति थे जिससे जनता बहुत परेशान रहती थी |
  • घनानंद के दरबार में एक कोटिल नामक एक व्यक्ति था |
  • एक दिन घनानंद ने कोटिल का अपमान करके उसे दरबार से भगा दिया था और बाद में फिर कोटिल चंद्रगुप्त के साथ मिलकर घनानंद को मारकर मौर्य वंश की स्थापना करता है |

मौर्य वंश

मगध साम्राज्य का उत्कर्ष का चोथा वंश-

मगध साम्राज्य का उत्कर्ष का सबसे महत्वपूर्ण वंश मौर्य वंश था जिसका काल 322bc से 185bc तक रहा, मौर्य वंश की स्थापना हुई थी एक एक प्रक्रिया के द्वारा जिसमें कहा जाता है कि चाणक्य जो कोटिल्य के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध रहे हैं | वह नंदवंश के राजा घनानंद के दरबार में रहते थे | जहां घनानंद क्रुरू शासक था | एक दिन उसने चाणक्य का अपमान करके उसे अपने दरबार से निकाल दिया था | वह अपने अपमान का बदला लेने के लिए उसने एक मार्ग खोजा उसी मार्ग की तलाश के क्रम में वह चंद्रगुप्त मोर्य से मिला और उसे राजनीतिक शिक्षा दी और उसकी सहायता से मौर्य वंश की स्थापना की |

नंदवंश के राजा को हराने के क्रम में चंद्रगुप्त की सहायता चाणक्य ने की तथा सारी जो रचना थी राजा को हराने के लिए वह सब चाणक्य के द्वारा रचित की गई थी और इसी का प्रणाम हमें मुद्राराक्षस में देखने को मिलता है |

जानकारी के स्रोत-

साहित्यिक-
1. अर्थशास्त्र
2. इंडिका
3. पुराण
4. मुद्राराक्षस
5. बोद्ध और जैन ग्रंथ

पुरातात्विक-
1. अशोक अभिलेख
2. भवन
3. सपूत
4. गुफा
5. मृदभांड
6. जूनागढ़ अभिलेख

चंद्रगुप्त मौर्य कौन थे

  • चंद्रगुप्त मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य थे |
  • ये 322 BC से 298 BC तक राजा बने रहे |
  • चंद्रगुप्त मौर्य को बोद्ध एवं जैन ग्रंथ में छत्रिय कहा गया है
  • जबकी मुद्राराक्षस पुराण आदि मैं उन्हें शूद्र कहा गया है
  • जस्टिस और एडूके जो यूनानी इतिहासकार हैं इन्होंने चंद्रगुप्त मोर्य को सेन्डरेकोटस कहां है |
  • एप्पियन और प्लूटार्क जो यूनानी इतिहासकार न्होंने चंद्रगुप्त मोर्य को एण्डरोकोटस कहा है |
  • सेन्डरेकोटस और एण्डरोकोटस शब्द का प्रयोग यूनानी किताबों में किया जाता है पहली बार इसकी पहचान विलियम जोंस ने की थी |
  • 305 BC में चंद्रगुप्त मौर्य के साथ सेलयुकस के साथ एक महत्वपूर्ण युद्ध हुआ था |
  • जिसमें से सेलयुकस चंद्रगुप्त मोर्य से हार गया था |
  • इस युद्ध के बाद एक समझोता हुआ था इस समझौते के क्रम में दो तीन बातें हुई थी –
    1. मेगारधनीज राजदूत जो सेलयुकस के दरबार में था वह चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में चला जाता है
    2. 500 हाथी चंद्रगुप्त मौर्य ने सेलयुकस को दिए थे और बदले में सेलयुकस ने अपने के चार क्षेत्र चंद्रगुप्त मौर्य को दिए थे |
    3. सेलयुकस की पुत्री हैलेन की शादी चंद्रगुप्त मौर्य के साथ होती है |
  • जस्टिन और प्लूटार्क के अनुसार 6,00,000 सेना के साथ पूरे भारत को रोढ डाला था |
  • चंद्रगुप्त मोर्य जैन धर्म को मानते थे

अंत में भणभाऊ जो जैन धर्म शाखा के हेड थे | 298 में भणभाऊ जब क्षवणबैलगोला जाते हैं तो चंद्रगुप्त भी उनके साथ जाते हैं और वहां जाकर चंद्रगुप्त अपने प्राण त्याग देते हैं | प्राण त्यागने की दो विधि थी जिनका नाम संकेयन या संपरा था जिसमें भूखे रहकर प्राण त्यागे जाते हैं |

बिंदुसार

  • 298 BC से 273 BC तक राजा बने रहे |
  • बिंदुसार को अमित्रघात के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ होता है शत्रु विनाशक
  • साथ ही जैन ग्रंथों में सिंहसेन कहा गया।
  • एक दिन जब बिंदुसार शासन कर रहे थे तो तक्षशिला मैं कई बार विद्रोह उभर रहे थे दो बार प्रमुख विद्रोह हुए यहां पर राजा की सत्ता को चुनौती देने का प्रयास जा रहा था इस चुनौती को दबाने के लिए बिंदुसार ने अपने दो पुत्रों को एक के बाद एक करके भेजा-
  • सबसे पहले उसने सुशीम को भेजा जो विद्रोह को दबाने में पूरी तरह से असफल रहा।
  • उसके बाद अशोक को भेजा जिसने उस विद्रोह को दबाया और उस घटना से लोगों ने कहा कि अशोक में प्रशासनिक योगिता है और वह एक अच्छा राजा बन सकता है
  • सीरिया के राजा एगियोकस थे जिसके पास बिंदुसार ने एक पत्र भेजा था उस पत्र में तीन चीजों की मांग की थी-
    1. एक सुखी अंजीर
    2. अंगूरी शराब
    3. दार्शनिक की मांग
  • एगियोकस ने इनमें से दो चीजों को अर्थात सुखी अंजीर और अंगूरी शराब को भेजने के लिए मान गया था पर उसने दार्शनिक को नहीं भेजा था क्योंकि उसका माना था कि यह उसकी परंपरा के विरुद्ध है
  • मिस्र के राजा टॉलमी फिलाडेल्फिया मैं एक राजदूत को बिंदुसार के दबाने भेजा था

अशोक

  • 269 BC से 232 BC तक राजा बना रहा |
  • 269 BC मैं राजा बना और राजा बनने से पहले वह मोर्य साम्राज्य के अवंती राज के राज्यपाल के रूप में शासन कर रहा था|
  • अशोक का नाम मास्की और गुर्जर अभिलेख से मिला है|
  • सबसे महत्वपूर्ण घटना 261 में घटित हुई थी जब वह अपने शासन के 8 वर्ष पूरे करके नवे वर्ष में प्रवेश कर रहा था तो वह अपनी सुरक्षा और व्यापार को बढ़ाने के उद्देश्य से कलिंग पर आक्रमण करता है और उसे जीत लेता है इस आक्रमण के बाद लाखों की संख्या में लोग मारे गए और लाखों लोग घायल हो गए जब अशोक युद्ध के बाद युद्ध भूमि में पहुंचा तो रोते-बिलखते लोगों को देखकर उसकी आंखें खुल गई और उसनेे उसी समय घोषणा कर दी कि “आज के बाद मैं युद्ध नहीं करूंगा, बल्कि युद्ध की जगह धम्म नीति को अपना लूंगा” अर्थात धर्म के मार्ग पर चलूंगा इसके बारे में अशोक ने अपने 13वे शिलालेख में बताया है
  • इस युद्ध के बाद वह एक बौद्ध भिक्षुक से मिला, जिसका नाम था| उपगुप्त और उसी उपगुप्त नामक भिक्षुक से उसने धर्म की शिक्षा ली और वहां से उसने बौद्ध धर्म को अपना लिया| बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद वह धर्म प्रचार के मार्ग पर निकल पड़ा और बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए उस ने कई प्रकार की नीतियों को अपनाया जैसे धर्म महामात्रो की नियुक्ति करना, विभिन्न शिलालेख का निर्माण करवाना, अलग-अलग जगहों पर शिलालेख बनवाना और उन पर अच्छे-अच्छे बातों को लिखवाना ताकि समाज में नैतिकता का प्रचार हो सके|
  • इसके अलावा उसने घूम-घूम कर महामात्रो की मदद से धर्म प्रचार को बढ़ाया इसके साथ ही वह स्वयं कई धर्म जगहों पर यात्राएं की और अपने शासनकाल में मासाहारी को बंद करवाने का फैसला किया| इस प्रकार से उसने धर्म को बहुत महत्त्व दिया|
  • इस प्रकार से बौद्ध धर्म का बहुत अधिक विस्तार इसी काल में देखने को मिलता है

अशोका वंश

  • अशोक के कई वंश थे लेकिन सबसे महत्वपूर्ण वंश अंतिम वाला था|
  • वृहद्रय यह मौर्य वंश का अंतिम वंश था जो 185 BC में उसे के खुद के सेनापति ने पुष्यमित्र द्वारा हत्या कर दी गई थी और उस हत्या के बाद मोर्य वंश खत्म हो गया था।

आगे की बात

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मौर्य वंश का प्रशासन

राजा सबसे हेड राजा होता था और जितनी भी प्रशासनिक व्यवस्था थी| जितनी भी सैनिक शक्ति, न्याय शक्ति, वह सारी की सारी शक्तियां राजा के पास होती थी| राजा अपने विभिन्न मंत्रियों और अधिकारियों के माध्यम से व्यवस्थाओं को चलाते थे| लेकिन फाइनल डिसीजन यह सबसे ज्यादा ताकतवर व्यक्ति राजा ही होता था| यहां तक कि मौर्य वंश केंद्रीय प्रशासन के रुप में भी जाना जाता है क्योंकि सारी शक्तियां केंद्र में निहित थी और हमें पता है कि पूरी प्रशासन का केंद्र राजा ही होता था| राजा की सहायता के लिए बहुत मंत्री होते थे| उन मंत्रियों को आमत्य कहा जाता था|

कुछ अन्य मंत्री भी होते थे जैसे- सेनापति, पुरोहित, आदि इसके अलावा भी मंत्रियों के साथ-साथ अधिकारी जन होते थे| जो राजा को प्रशासनिक व्यवस्था को चलाने में मदद करते थे उन धिकारियों को शीर्षस्थ अर्थात तीर्थ कहकर संबोधित किया जाता था| इन सभी अधिकारियों के द्वारा राजा प्रशासन को चलाता था|

प्रमुख मंत्री

  • समाहर्ता – राजस्व विभाग के प्रधान जो बलि, भाग (tax) के कामों को देखते थे|
  • सन्निघाता – राजकीय कोषाध्यक्ष जैसे वर्तमान में वित्तमंत्री|
  • सीताध्यक्ष – राजकीय कृषि विभाग के अध्यक्ष जो संपूर्ण किसी गतिविधियों को देखते थे| सीता भूमि बहुत परिचित थी सीता भूमि का अर्थ सरकारी भूमि अर्थात राजस्व भूमि को सीता भूमि कहते थे|
  • पग्ध्यक्ष – वाणिज्य विभाग के अध्यक्ष|
  • अक्षपटलाध्यक्ष – महालेखाकार आदि।

सैन्य विभाग

यहां एक महत्वपूर्ण विभाग था क्योंकि मौर्य वंश का विस्तार बहुत बड़ा था| यह लगभग अफगानिस्तान के उत्तर, पाकिस्तान आदि क्षेत्र भी भारत में शामिल थे| इसलिए इतने बड़े साम्राज्य को चलाने के लिए सैनी विभाग होना जरूरी था| विभाग का हैड जो होता था वह सेनापति कहलाता था| सेनापति अध्यक्ष से सेना का संचालन और राजा का सहयोग करते थे| उस समय के इतिहासकारो में जस्टिक और पिन्नी ने बताया है कि मौर्य काल में चार प्रकार की सेना देखने को मिलती है-
1. पैदल सेना
2. हाथी सेना
3. घुड़सवार सेना
4. रथ सेना

पिन्नी के अनुसार लगभग 600000 पैदल सेना, 30,000 घुड़सवार सेना और 9000 हाथी सेना चंद्रगुप्त मौर्य की सेना में शामिल थी| जिसकी सहायता से उसने पूरे भारत को जीत लिया था।

न्याय व्यवस्था

प्रशासन एक मुख्य बिंदु होता है कि जहां न्याय व्यवस्था अच्छी होगी वहां पर प्रशासन लंबे समय तक चल सकता है ऐसे मैं यहां पर एक अच्छा प्रशासन होने के साथ साथ न्याय व्यवस्था भी अच्छी देखने को मिली है इसमे न्याय का सबसे बड़ा व्यक्ति स्वयं राजा ही होता था| लेकिन इतने बडे और विशाल साम्राज्य मैं न्याय कर पाना कठिन था| ऐसे मैं अलग-अलग छोटे-छोटे क्षेत्र में कई ऐसे संस्थाएं न्यायालय स्थापित किए गए थे इन स्थानीय न्यायालय कि जो हैड होते थे उन्हें राजू कहा जाता था लेकिन न्यायालय दो भागों में विभाजित था-

  1. पहला जिसमें दीवानी मामले सुलझाए जाते थे जैसे- जमीन से जुड़े हुए मामले आदि उन्हें धर्मस्थानीय कहते थे|
  2. दूसरा जिसमें फौजदारी मामले सुविधाएं जाते जैसे- चोरी, डकैती, खून आदि उन्हें कंरकशोधन कहते थे|

गुप्तचर

न्याय व्यवस्था के साथ-साथ राजा को अपने बाहरी विभाग से सूचना प्राप्त करने के लिए एक गुप्तचर की जरुरत होती थी और इस तरह से यहां पर एक विभाग गुप्तचर विभाग भी बनाया गया था गुप्तचर की नियुक्ति की जाती थी और गुप्तचर के माध्यम से राजा के प्रति समाज में क्या भावना है| यह पता करने का प्रयास किया जाता था| इसके अलावा राजा के विरुद्ध किए जा रहे सरयंत्र का पता लगाने के लिए भी गुप्तचर की सहायता ली जाती थी |

गुप्तचर को अर्थशास्त्र में गूढ पुरुष कहा जाता था| इसके अलावा गुप्तचर के संबंध में अर्थशास्त्र में एक जानकारी मिलती है कि गुप्तचर दो प्रकार के होते थे-
1. पहला जो किसी एक स्थान पर रहकर राजा के संबंध में या समाज के संबंध में जानकारी इकट्ठा करता है उसे संस्था कहते थे|
2. दूसरा जो पूरे समाज में घूम-घूम कर सोचना है इकट्ठा करता था उसे संचार कहते हैं|

प्रांत

जैसे कि हमें पता है कि हमारे देश को कई राज्यों बाटा गया | उसी प्रकार से मोर्य साम्राज्य जो इतना विशाल था उसे भी 5 प्रांतों में बाटा गया था| इन प्रांतों को चक्र भी कहते है-

  1.  उत्तरापंथ इसकी राजधानी तक्षशिला थी |
  2.  दक्षिणापंथ इसकी राजधानी स्वर्णगिरी थी
  3. प्राशी (पूर्वी) इसकी राजधानी पाटलीपुत्र थी
  4. अवंती इसकी राजधानी उज्जयिनी थी |
  5. कलिंग इसकी राजधानी तोसली थी |

विषय

प्रांतो को छोटे-छोटे पार्ट में विभाजित किया गया था | जिसे विषय कहा जाता था| इन विषय के जो हैड होते थे| उसे विषयपति कहते थे|  जबकि प्रांतो के जो हैड होते थे|  वे राजा के पुत्र होते थे जिसे कुमार कहा जाता था| विषयो के नीचे भी छोटे छोटे गांव बनाए गए थे | जिसमें 10 गांव के समूह को “गोप” कहा जाता था| और इसमें सबसे छोटी इकाई ग्राम थी ग्राम के हेड ग्रामीक और बड़े इकाई देश

नगर प्रशासन

जैसे कि हमारे देश में कुछ नगर हैं तो कुछ गांव होते हैं तो इस प्रकार मोर्य साम्राज्य में भी कुछ नगर थे उन नगरों को चलाने के लिए एक अलग प्रकार का प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत थी क्योंकि नगरों की संख्या हमेशा ज्यादा होती थी प्रशासन दुविधा बढ़ जाती था तो ऐसे मैं नगर प्रशासन को चलाने के लिए विशेष प्रशासन की जरुरत पड़ी-

मेगास्थनीज मैं अपनी indica पुस्तक में इस नागरी प्रशासन के संबंध में विस्तार चर्चा की है इसने बताया है कि नगर प्रशासन को अच्छे ढंग से चलाने के लिए 6 प्रकार की समितियां बनाई गई थी और सभी समितियां को अलग-अलग काम दिए गए थे इसके अलावा सभी समितियों में पांच पांच सदस्य होते थे अर्थात एक समिति में पांच सदस्य होते थे और कुल 6 समितियां थी तो इस प्रकार से टोटल 30 सदस्यों के कमेटी होती थी इस सदस्यों द्वारा ही नगर प्रशासन काम कर पाता था

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मौर्य समाज

कोटिल्य के अनुसार प्राचीन काल की तरह ही समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अर्थात 4 वर्ग में समाज बटा हुआ था |लेकिन कोटिल्य ने यह भी बताया है कि समाज में परिवर्तन आ गया था जिससे शूद्र की स्तिथि ठीक हो गई थी कोटिल्य के अनुसार दास प्रथा थी

मेगास्थनीज के अनुसार समाज 7 वर्ग में विभाजित था इसका वास्तविक कारण यहा है कि मेगास्थनीज ने भारतीय समाज को उसकी व्यवस्था के आधार पर नहीं, बल्कि उसके कामों के आधार पर बाटा है| यही कारण है कि मेगास्थनीज ने इन्हें भारतीय समाज को 7 वर्गों में बांटा है और मेगास्थनीज के अनुसार दास प्रथा नहीं थी |

  1.  दार्शनिक
  2.  किसान
  3. अहीर
  4. कारीगर
  5. सैनिक
  6. निरीक्षक
  7. समास्थ अर्थात राजा के की सभा में पार्टिसिपेट करने वाला

– स्त्रीयो की स्थिति ठीक थी क्योंकि उन्हें शिक्षा का अधिकार मिला था पर इतनी भी अच्छी नहीं थी क्योंकि तलाक की प्रथा भी थी और इसके साथ ही यहां वेश्यावृत्ति की भी प्रथा थी जो स्त्रियां वेश्यावृत्ति करती थी उन्हें रूपाजीवा कहा जाता था|

मौर्य वंश की अर्थव्यवस्था

अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि था और कृषि कार्य से टैक्स प्राप्त करके राजा अपने राजस्व को बड़ते थे | मोर्य काल में जो कृषि पर टैक्स लिया जाता था वह लगभग 1/6 से 1/4 लिया जाता था और टैक्स की वसूली राजस्व करता था टैक्स वसूली करके राजकोष में रखते थेऔर इन्हीं के माध्यम से राजा खर्च और प्रशासन को संचालित करता था|

  •  इसका आर्थिक स्रोत व्यापार था जो कि आंतरिक और बाहय दोनों प्रकार से होता था|
  •  प्रमुख उद्योग वस्त्र था|
  •  व्यापार को संचालित करने के लिए मुद्रा का प्रयोग किया जाता था|
  • यहां व्यापार के संबंध में टैक्स की चोरी भी की जाती थी और चोरी करने वालों को मृत्युदंड दिया जाता था| इतना कठोर नियम इसलिए बनाया गया था क्योंकि राजा के पास अगर आय नहीं होगी तो वह कहीं से भी प्रशासन को नहीं चला पाएगा और राजतंत्र कि यह एक परंपरा होती है कि जितना कठोर नियम होगा, उतना ही राजतंत्र access कर पाएगा।
  • भडोज एक प्रमुख बंदरगाह था जिसका बहुत अधिक प्रयोग किया जाता था

मौर्य वंश की कला

सिंधु घाटी सभ्यता के बाद कला व्यवस्थित विकास मोर्य काल में प्रारंभ होता है अर्थात सिंधु घाटी सभ्यता में कला के विभिन्न रुप देखने को मिलते हैं| जैसे- बडी संख्या में वहां से अलग-अलग नगर प्राप्त हुए, नगरीय संरचना देखने को मिली, कच्ची पक्की ईटो का प्रयोग और मूर्तियां आदि देखने को मिलती हैं सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद वेदिक सभ्यता में कला विलुप्त हो जाती है, बहुत कम मात्रा में कला देखने को मिलती है लेकिन मौर्य काल में कला व्यवस्थित रुप से प्रारंभ होती है | मोर्य काल में कला पत्थरों पर की जाती थी ताकि वह लंबे समय तक टिक सके |

शिलालेख

  • शिलालेख की संख्या 14 है|
  • यहा भारत के अलग-अलग जगहों से मिला है|
  • प्रथम शिलालेख – पशुबली की निंदा|
  • चौथा शिलालेख – भरीघोष की जगह धम्मघोष|
  • भरीघोष का मतलब “युद्ध की नीति”|
  • धम्मघोष का मतलब “धर्म की नीति”|
  • पांचवा शिलालेख – महामात्रो की नियुक्ति |
  • सातवां और आठवां शिलालेख – तीर्थ यात्रा का उल्लेख|
  • तेरहवा शिलालेख – कलिंग युद्ध और ह्रदय परिवर्तन का वर्णन|

शीलालिखो की खोज

  • पोदेटी फेन्यलर ने 1750ई. वी. में की थी ।
  • शिलालेख पर लिखी गई भाषा ब्राहमी, खरोष्ठी, ग्रीक, अरमाइक लिपि थी| जिसके कारण शुरू में इसे पढ़ा नहीं जा सका | बाद में बहुत प्रयास के बाद 1837 मैं जेंस प्रिसेय ने पहली बार पढ़ा था |

लिपीयो की विशेषता

  •  ब्राहमी – बाईं ओर से दाएं और लिखी जाती है
  • खरोष्ठी – दाएं ओर से बाई और लिखी जाती हैं
  • ग्रीक और अरमाइक पाकिस्सेतान और अफगानिस्तान में मिली है ।

स्तंभ

स्तंभ

सारनाथ स्तंभ – यह इंपॉर्टेंट है इसमें चार शेरों के सिर लगे होते हैं और इसके नीचे घोड़े,हाथी, शेर,बैल और इसके नीचे 24 तीलियों वाला चक्र होता है इसी में से हमारे राष्ट्रीय चिंह लिया गया है|

महालेख

बराबर की पहाड़ियों में आजीविको के लिए अशोक ने निवास स्थान बनाया था और बाद में उसके पोत्र दशरथ ने नागार्जुन पहाड़ी में गुफा का निर्माण करवाया था जो कहीं ना कहीं कला को संबोधित करता है|

स्तूप

स्तूप

प्रमुख स्तूप सांची, भरहूल|
प्राचीन ग्रंथ से यह पता चला है कि अशोक ने 84000 स्तूप बनवाए थे|

राजप्रसाद

यह राजा का महल था| यह मोर्य काल मे बहुत प्रसिद्ध रहा चंद्रगुप्त मौर्य जो मौर्य वंश के संस्थापक थे| उन्होंने एक राजा का महल पाटलीपुत्र में बनवाया था और इस महल के संबंध में जितने भी विदेशी यात्रिओं ने इसके बारे में लिखा है कि यह एक ऐसा महल था जिसकी तुलना देवताओं के महल से की जा सकती है इस महल की सबसे बड़ी वे विशेषता यह थी कि 80 पिलर पर बना विशाल महल था उस पिलर का निर्माण पत्थरों से किया गया था और पहली बार देखने को मिलता है कि बड़े-बड़े महलों में पत्थरों का उपयोग किया जाता है इस महल की जो छत और फर्श थी वह लकड़ी की बनी हुई थी|

अशोका का धम्म

अशोक ने जब कलिंग के साथ युद्ध करने के बाद ह्परदय परिवर्तन किया तो उसने बौद्ध धर्म को अपना लिया था | बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद उसने कई तरह की नई नीति और कई सारे विचारों को अपनाया | यही कारण है कि बहुत सारे इतिहासकार अशोक के धम्म को एक अलग रुप में देखते हैं और ऐसा मानते है कि अशोका का जो धम्म है वह केवल बोद्ध धर्म ही नहीं, बल्कि उस में कई धर्म का सार था इस कारण अशोक के धर्म को सभी धर्मों के सार के रूप में देखा जाता है |और इस धर्म को केवल बौद्ध धर्म नहीं माना जाता बल्कि नैतिकता आधार सभी धर्मों का मिला-जुला रुप में देखा जाता है |

धर्म प्रचार के लिए प्रसार

  • अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा था ताकि वहां जाकर बुद्ध धर्म का प्रचार कर सके|
  • इसी प्रकार से उसने अपनी पुत्री को नेपाल भेजा ताकि वह वहां जाकर धर्म का प्रचार कर सके|
  • धम्म महामात्रो की नियुक्ति की गई यह एक ऐसा पद था जिसका काम था कि वह प्रतेक 5 वर्षों में घूम-घूम कर समाज में के लोगों को धार्मिक मामलों के बारे में जागरूक करें|
  • शिलालेख स्तंभ सपूत का निर्माण|
  • साथ ही अशोक कई धर्म यात्रो पर गया था |

धम्म यात्रा का क्रम

गया से कुशीनगर, कुशीनगर से लुम्बनी, लुम्बनी से कपिलवस्तु, कपिलवस्तु से सारनाथ, सारनाथ से क्षाव्ती

इसके अलावा अशोक पहली बार अपने शासन के 10 वे वर्ष में बोधगया की यात्रा की थी और फिर 20 वे वर्ष में रुम्मिढेई की यात्रा पर गया था |

इन सभी की वजहों के करण मगध साम्राज्य का उत्कर्ष इनता विशाल और बड़ा हुआ था |

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7 thoughts on “मगध साम्राज्य का उत्कर्ष – हर्यक वंश, शिशुनाग वंश, नंद वंश, और मौर्य वंश

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