मुख्यमंत्री कैसे बने-शक्तियां एवं कार्य, वेतन और शपथ

नमस्कार! इस आर्टिकल में हम मुख्यमंत्री के बारे में जानेंगे। इसके पहले हमने राज्यपाल के बारे में जाना था जो राज्य की कार्यपालिका का हेड होते है, But राज्य के वास्तविक हैड मुख्यमंत्री होते हैं जो जनता के द्वारा चुने जाते हैं।

इस आर्टिकल में मुख्यता मुख्यमंत्री के बारे में जानने का प्रयास करेंगे और इस प्रकाश से समझने की कोशिश करेंगे कि यदि Exam में इस से related कोई प्रश्न आता है, तो उसे आसानी से हल किया जा सके।

मुख्यमंत्री

  • राज्य के वास्तविक हेड होते हैं।
  • अनुच्छेद 164 के तहत राज्य में एक पद होगा। जिसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
  • जिस प्रकार से केंद्र स्तर पर प्रधानमंत्री होते हैं उसी प्रकार से राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री होते हैं।
  • लेकिन उनकी पावर एक जैसा नहीं होता है।
  • तुलनात्मक दृष्टि से जिस प्रकार से राज्यपाल और राष्ट्रपति के कार्य लगभग-लगभग एक जैसे होते हैं। उसी प्रकाश से मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के कार्य होते हैं।
  • 2018 में एक बहुत बड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में आया था इस मामले के अंतर्गत यह चर्चा हुई थी कि मुख्यमंत्री के पास ज्यादा पावर होनी चाहिए या राज्यपाल के पास।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर कहा था कि राज्यपाल चुंकि जनता के द्वारा चुनकर नहीं आए हैं, बल्कि ये जनता के द्वारा चुनकर आए हैं इसलिए ज्यादा शक्तियां इनके पास होंगी।

मुख्यमंत्री कैसे बना जाता है?

मुख्यमंत्री बनने के लिए यदि राज्य स्तर पर दो सदन विधानसभा और विधान परिषद है, तो मुख्यमंत्री बनने वाले व्यक्ति को इन दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य होना जरूरी है। यदि वह इन दोनों में से किसी का भी सदस्य नहीं है तो उसे सदस्य बनना होगा। But जिन राज्यों में विधान परिषद् नहीं है इस स्थिति में उसे विधानसभा का सदस्य बनना पड़ता है और इन्हीं में से जो सदस्य होते हैं उन्हें राज्यपाल मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करते है

मुख्यमंत्री के बनने के क्रम में विधान परिषद् या विधानसभा के किसी भी सदस्य को डायरेक्ट ही मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है। जब इनकी नियुक्ति की बात आती है तो उस समय विधान परिषद् का केवल सदस्य होना जरूरी होता है। लेकिन जब नियुक्ति करते हैं, तब विधान परिषद् की कोई भी जरूरत नहीं होती है, बल्कि विधानसभा की जरूरत पड़ती है।

विधानसभा में बहुत बहुमत दल होते हैं जो बहुमत दल बहुत अधिक बहुमत पेश करता है अर्थात लगभग 50% से अधिक बहुमत पेश करने वाले को राज्यपाल के द्वारा मुख्यमंत्री बना दिया जाता है।

एक और बात मैं आपको बता दूं कि भले ही राज्यपाल मुख्यमंत्री को नियुक्त करता है लेकिन जब पावर की बात आती है तो सबसे ज्यादा पावर इनके पास होती है ना कि राज्यपाल के पास।

शपथ

  • इनको राज्यपाल के समक्ष शपथ लेना होता है।
  • राज्यपाल के समक्ष में शपथ लेना होता है कि मैं राज्य के सभी कार्यों को अच्छे ढंग से करूंगा और सावधान के सभी नियमों को कड़ाई से पालन करूंगा

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कार्यकाल

  • कार्यकाल सामान्यता 5 वर्ष का होता है लेकिन यह समय फिक्स नहीं होता है।
  • ये चाहे तो बीच में ही एक त्याग पत्र राज्यपाल को देखकर पद से हट सकते हैं।
  • इसके अलावा वे यदि बहुमत खो देते हैं, तो भी उन्हें पद से हटना होता है।
  • इसके साथ ही कुछ ऐसी परिस्थितियां बन जाती हैं जिनमें यदि उनका अपना बहुमत दल यह प्रस्ताव रखता है कि इन्हें पद से हटाया जाए। हम इन्हें मुख्यमंत्री के पद पर नहीं देखना चाहते हैं। तो ऐसे में राज्यपाल अपनी प्रसाद पर्यंत शक्ति का प्रयोग करके उन्हें पद से हटा सकते हैं।

वेतन

जैसा कि हमें पता है कि राज्यपाल, राष्ट्रपति आदि का वेतन ( पैसा ) फिक्स होता है। लेकिन क्या इनका वेतन भी फिक्स होता है? “नहीं” इनका वेतन फिक्स नहीं होता है। इनका वेतन विधानमंडल के द्वारा तय किया जाता है अर्थात जिस राज्य के वे मुख्यमंत्री हैं उस राज्य के विधानमंडल को यह शक्ति दी गई है कि वे बिल लेकर आएं और बिल को पास करके अपने जितने भी मुख्यमंत्री उपमंत्री आदि हैं उनके वेतन का निर्धारण करें। इस प्रकार से सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों का वेतन अलग अलग होता है।

शक्तियां एवं कार्य

  • अनुच्छेद 167 के तहत मुख्यमंत्री के कर्तव्य का वर्णन किया गया है।
  • यह राज्यपाल के एक एजेंट के रूप में राज्य में कार्य करता है।
  • अनुच्छेद 167 के तहत ये राज्यपाल को बताएंगे कि वे कौन-कौन से कार्य कर रहे हैं।
  • ये राज्यपाल को राज्य से अवगत कराएंगे कि राज्य की क्या स्थिति है।
  • जिस प्रकार से प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्री परिषद होता है। उसी प्रकार से यहां मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्री परिषद कार्य करते हैं।
  • मंत्री परिषद के मंत्रियों को उनके विभाग शोपना इनका कार्य होता है।
  • यदि मंत्री अच्छा काम नहीं करते हैं तो मुख्यमंत्री राज्यपाल से कहकर उन्हें पद से हटवा या बदलावा देते हैं।
  • मंत्री परिषद् के द्वारा काम करवाने की शक्ति इन के पास होता है।
  • इसके अलावा मंत्रियों से सड़क विकास, परिवहन विकास से लेकर राज्य के विभिन्न कामों को करवाने का पावर इनके पास होता है।
  • इस प्रकार से मंत्री परिषद् पर पूरा कंट्रोल मुख्यमंत्री का ही होता है।

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